Farrukhabadi Alukam Raclette: फर्रुखाबादी आलूकम-रैक्लेट (Farrukhabadi Alukam Raclette) दो अलग-अलग भोजन संस्कृतियों का शानदार फ़्यूज़न (Fusion) है। एक तरफ उत्तर प्रदेश के Farrukhabad गंगा-कटरी क्षेत्र की पारम्परिक आग में भुने आलू की संस्कृति, तो दूसरी तरफ स्विट्जरलैंड का प्रसिद्ध पिघला हुआ रैक्लेट (Raclette) चीज़ है।
फर्रुखाबाद का भुना आलू – Alukam / Bhuna Aloo
उत्तर प्रदेश का फर्रुखाबाद और इसके आसपास का क्षेत्र अपनी उपजाऊ मिट्टी और बेहतरीन आलू की पैदावार के लिए पूरे देश में जाना जाता है। सर्दियों के दिनों में खेतों में या गंगा के किनारे कंडे (उपले) की आग और गरम बालू में छिलके सहित आलू भूनकर खाने की यहाँ दशकों पुरानी परंपरा रही है। इसे स्थानीय भाषा में ‘भुना आलू’ कहा जाता है, जिसे सिलबट्टे पर पिसी तीखी हरी धनिया-मिर्च की चटनी और खास मसालों के साथ परोसा जाता है।
स्विट्जरलैंड का ‘रैक्लेट’ – Swiss Raclette
दूसरी तरफ स्विट्ज़रलैंड में ‘रैक्लेट’ (Raclette) का इतिहास 19वीं शताब्दी से जुड़ा है। आल्प्स पर्वत के चरवाहे लकड़ी की आग पर चीज़ के बड़े ब्लॉक्स को पिघलाते थे और उस पिघली हुई मलाईदार सतह को भुने हुए आलुओं पर खुरचकर (Scrape करके) गिराते थे। फ्रेंच शब्द Racler का मतलब ही “खुरचना” होता है।
Farrukhabadi Alukam Raclette: क्यों खास है यह इंडो-स्विस डिश?
जब फर्रुखाबाद के देसी अंगारों पर भुने धुएँदार आलू पर स्विट्ज़रलैंड का मलाईदार, नमकीन और पिघला हुआ रैक्लेट चीज़ डाला जाता है, तो चीज़ का भारीपन आलू के स्मोकी फ्लेवर से बिल्कुल मेल खाता है। इसके ऊपर तीखी हरी धनिया-लहसुन की चटनी और चाट मसाला डालने से चीज़ का फैट कटता है और जीभ को ज़बरदस्त चटपटा स्वाद मिलता है।
आवश्यक सामग्री – Ingredients
मध्यम आकार के आलू
रैक्लेट चीज़
ताज़ा हरा धनिया
हरी मिर्च
लहसुन
अदरक
नींबू
जीरा
नमक
चाट मसाला
भुना जीरा पाउडर
बनाने की विधि
इसे बनाने के लिए सबसे पहले मध्यम आकार के कड़े आलुओं को छिलके सहित धोकर सुखा लिया जाता है। पारम्परिक तरीके से इन्हें कंडे या कोयले की आग और बालू में तब तक भूना जाता है जब तक छिलका बाहर से कुरकुरा और अंदर से आलू पूरी तरह से नर्म न हो जाए। इसके साथ ही हरा धनिया, हरी मिर्च, लहसुन, अदरक, नींबू का रस, जीरा और नमक मिलाकर सिलबट्टे या मिक्सी में बेहद कम पानी के साथ गाढ़ी और तीखी चटनी तैयार की जाती है। जब आलू पूरी तरह भून जाएँ, तब रैक्लेट चीज़ की स्लाइस को ग्रिल या ढक्कन वाले नॉन-स्टिक पैन में धीमी आँच पर पिघलाया जाता है ताकि उसमें बुलबुले उठने लगें।
प्लैटिंग और सर्विंग
परोसते समय भुने हुए गर्म आलू को प्लेट में रखकर बीच से हल्का सा दबाकर खोला जाता है। इसके अंदरूनी गर्म हिस्से पर सबसे पहले गाढ़ी हरी धनिया चटनी की एक परत लगाई जाती है और तुरंत ऊपर से पिघला हुआ गरमा-गरम रैक्लेट चीज़ उड़ेल दिया जाता है। आखिर में इसके ऊपर चाट मसाला, भुना जीरा और काला नमक छिड़ककर इसे तुरंत परोसा जाता है।

मेला रामनगरिया और ‘भुने आलू’ का अटूट नाता
फर्रुखाबाद में हर वर्ष माघ के महीने ने ‘मेला रामनगरिया’ का आयोजन होता है। यह केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि इस माटी की सांस्कृतिक पहचान और जायके का सबसे बड़ा संगम है। गंगा तट (पांचाल घाट) पर लगने वाले यह कल्पवास मेला महाभारत कालीन पंचाल देश की प्राचीन अध्यात्म परंपरा को संजोए हुए है।
गंगा और रामगंगा की बेहद उपजाऊ दोआब मिट्टी (कटरी क्षेत्र) के कारण फर्रुखाबाद की पहचान देश की ‘आलू राजधानी’ के रूप में बनी। इस माटी में उगे आलू की अपनी एक प्राकृतिक मिठास और सोंधापन होता है, जो इसे अन्य क्षेत्रों से अलग बनाता है। कल्पवासियों और मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए कंडे की आग और बालू में भुने आलू केवल भोजन नहीं, बल्कि ठंड के मौसम में गंगा किनारे मिलने वाला सात्विक और ऊर्जावान चटकारा बन गए।
माघ मेले में रोज़ाना जुटने वाले हज़ारों लोग दिनभर गंगा मैया के दर्शन और भ्रमण के बाद विशेष सिलबट्टे की चटनी (धनिया, टमाटर, मिर्च, लहसुन) और स्थानीय मसालों के साथ भुने आलू खाते हैं। बड़े-बड़े शहरों से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों का मानना है कि जो सोंधापन यहां की भट्टी और रेट में भुने आलू में है, वह कहीं और नहीं मिलता है।

