World Heritage Day 2026: हमारी विरासत सिर्फ़ पत्थरों, लिपियों या खंडहरों से नहीं बनी है। यह मंदिर की दीवार की प्रत्येक फुसफुसाहट, प्राचीन किलों की प्रत्येक नक्काशी और पीढ़ियों से चले आ रहे प्रत्येक लोकगीत में मौजूद है। यह हमें बताती है कि हम कौन थे, हम किसके लिए खड़े थे और हमने वक्त के थपेड़ों को कैसे सहन किया। 18 अप्रैल को जब पूरी दुनिया ‘विश्व धरोहर दिवस’ मनाने जा रही है, तो यह केवल पुराने स्मारकों की प्रशंसा करने का दिन नहीं है, बल्कि उन ‘कालातीत निधियों’ को संरक्षित करने का संकल्प लेने का भी अवसर है।
विरासत के संरक्षण का वैश्विक आह्वान
स्मारकों और स्थलों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस की नींव 1982 में ‘इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स’ (ICOMOS) द्वारा रखी गई थी, जिसे 1983 में यूनेस्को ने आधिकारिक मान्यता दी। इस वर्ष की थीम—”Emergency Response for Living Heritage in contexts of Conflicts and Disasters” (संघर्षों और आपदाओं के संदर्भ में जीवंत विरासत के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया)—अत्यंत गंभीर और प्रासंगिक है। आज जब दुनिया के कई हिस्से युद्ध और जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं, हमारी ‘जीवंत विरासत’ (जैसे परंपराएं, कला और सामुदायिक ज्ञान) सबसे अधिक खतरे में है।
भारत की बढ़ती सांस्कृतिक धमक
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में विश्व धरोहर सूची में अपनी उपस्थिति का निरंतर विस्तार किया है। 1983 में आगरा के किले, ताजमहल और अजंता-एलोरा की गुफाओं से शुरू हुआ यह सफर आज 43 विश्व धरोहर स्थलों तक पहुँच चुका है।
हाल ही में, जुलाई 2024 में असम के “मोइदम्स: अहोम राजवंश की टीला-दफन प्रणाली” को सूची में शामिल किया जाना भारत के लिए गर्व का क्षण रहा। यह न केवल उत्तर-पूर्व भारत की समृद्ध संस्कृति को वैश्विक मंच पर लाया, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत की विरासत केवल उत्तर या दक्षिण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके हर कोने में इतिहास की गहरी जड़ें हैं। वर्तमान में, भारत के 62 और स्थल यूनेस्को की संभावित सूची में हैं, जो हमारी भावी सांस्कृतिक शक्ति का संकेत देते हैं।
यूनेस्को और वैश्विक उत्तरदायित्व
1972 के ‘विश्व धरोहर सम्मेलन’ ने पूरी मानवता के लिए मूल्यवान स्थलों को खोजने और उनकी देखभाल करने का एक ढांचा तैयार किया। आज इस सम्मेलन से 196 देश जुड़े हुए हैं। विश्व स्तर पर कुल 1,223 स्थल (952 सांस्कृतिक, 231 प्राकृतिक और 40 मिश्रित) इस सूची का हिस्सा हैं। भारत 1977 में इस सम्मेलन का हिस्सा बना और तब से अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विविधता को सहेजने में अग्रणी रहा है।
विरासत केवल इतिहास नहीं, भविष्य का मार्गदर्शक है
अक्सर हम विरासत को ‘बीता हुआ कल’ मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सीखने की पाठशाला है। चाहे वह प्राचीन जल संचयन तकनीकें हों या भूकंप-रोधी स्थापत्य कला, ये स्थल हमें आधुनिक समस्याओं के समाधान भी प्रदान करते हैं।

